Osho-Poona2-1प्रेम सीढ़ी है। सीढ़ी पर रुकना मत। सीढ़ी बड़ी दूरगामी है। तुमने धन का प्रेम जाना है, धर्म का प्रेम भी जानो। तुमने शरीर को प्रेम किया है; और थोड़े गहरे, और थोड़े गहरे उतरो-और तुम पाओगे कि शरीर में ही छिपी हुई आत्मा की झलकें मिलने लगीं। तुमने व्यक्तियों को प्रेम किया है; थोड़ा और गहरे जाओ, और व्यक्तियों में छिपे हुए तुम समष्टि को पाओगे। तुमने अभी रूप को पहचाना है; अरूप भी वहीं छिपा है, पास ही खड़ा है, ज्यादा दूर नहीं है। रूप के भीतर ही छिपा है। रूप अरूप का ही एक ढंग है।

आकार निराकार की ही एक तरंग है। लहर सागर ही है। लहर में सागर ही लहराया है। लहर को सागर से भिन्न मत मान लेना। संसार को परमात्मा से भिन्न मत मान लेना। जैसे नर्तक को नृत्य से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही स्रष्टा को सृष्टि से अलग नहीं किया जा सकता।

~ OSHO

मैं भारतीय नहीं हूँ। मैं इस सारी पृथ्वी का हूँ। यह सारी पृथ्वी मेरा घर है। मैं उतना ही भारतीय हूँ जितना मैं जापानी हूँ, जितना मैं चीनी हूँ। मैं इस पूरी पृथ्वी को एक मानकर चल रहा हूँ। मेरी दृष्टि में राष्ट्र समाप्त हो गए हैं, राष्ट्रों की सीमाएँ विलीन हो गई हैं। इसलिए तुम यह ‘भारत’ शब्द को बार-बार उठाने की चेष्टा छोड़ दो; मेरे लिए इसका कोई मूल्य नहीं है। यह सिर्फ एक औपचारिक बात है, नक्शे की बात है। लेकिन मैं भारतीय हूँ नहीं — उस अर्थ में भारतीय नहीं हूँ जिस अर्थ में विवेकानंद भारतीय हैं। उन्हें लगता है भारत कुछ खास, विशिष्ट धर्मभूमि, पुण्यभूमि! मैं राष्ट्रवादी नहीं हूँ। राष्ट्रवाद रोग है! और संसार काफी तड़प लिया है इस रोग से। अब यह राष्ट्रवाद जाना चाहिए।

मैं अंतर्राष्ट्रीय हूँ। मेरे लिए गीता उतनी ही अपनी है जितनी बाइबिल और जितना कुरान। मैं न हिंदू हूँ, न मुसलमान, न ईसाई। जीसस से मुझे उतना ही प्रेम है जितना कृष्ण से। और लाओत्सु से मेरा उतना ही लगाव है जितना पतंजलि से। मैं सारे जगत की जो आध्यात्मिक संपदा है, उसकी वसीयत की घोषणा करता हूँ। सारे जगत की आध्यात्मिक संपदा की वसीयत मेरी है।

इसलिए कोई मुसलमान मुझसे यह न कहे कि मैं कुरान पर क्यों बोला? कुरान मेरा है! कोई हिंदू मुझसे यह न कहे कि मैं गीता पर क्यों बोला? गीता पर बोलने के लिए मेरा हिंदू होना जरूरी नहीं है। जैसे हिमालय और उसके सौंदर्य की प्रशंसा करने के लिए मेरा भारतीय होना जरूरी नहीं है, आल्प्स पर्वत की चर्चा करने के लिए मेरा फ्रांसीसी होना जरूरी नहीं है — उसी तरह गीता, कुरान, ताओ-तेह-किंग या धम्मपद, इनकी चर्चा करने के लिए मेरा किसी देश से आबद्ध होना आवश्यक नहीं है।

सारे जगत की संस्कृति मेरी है। सारे जगत के जाग्रत पुरूष, वे दीये कहीं भी जले हों, किसी ढंग के रहे हों, उनकी ज्योति मेरी है। इस बात को तुम कभी भूलना मत।

प्यारे ओशो🌹🌹🌹🌹🌹

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