IMG-20171208-WA0129IMG-20171208-WA0130vlcsnap-2017-12-08-23h46m54s632vlcsnap-2017-12-08-23h50m04s141जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं: श्री देवकीनंदन ठाकुर 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में भायंदर पूर्व शहर, मुम्बई में मथुरा वृन्दावन से आये श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखार बिंदु से विशाल श्रीमद भागवत महापुराण कथा सप्ताह का भव्य आयोजन 6 से 13 दिसंबर 2017 तक चल रहा है

मुंबई। विश्व शांति सेवा समिति मुंबई एवं विश्व शांति चेरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में भाईंदर में आयोजित भागवत कथा में पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया । बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया  । इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है  श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा । इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा । व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है । इसलिए अच्छे कर्म करो । भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भागवत की कथा सुनो। देवकीनंदन जी की भागवत के अनुसार कलयुग की चर्चा करते हुए बताया कलयुग में लोगों की स्थिति विचित्र होगी।  लोग अशुभ को समझ नहीं पाएंगे । कलयुगवासी गाय के बजाय बकरियां पालेंगे और देखा भी तो जा रहा है । लोग कुत्ते पाल लेते हैं लेकिन गाय नहीं पालते। संबंधों के बाबत कलयुग के बारे में कहा गया है कि बेटा बाप को आदेश देगा, बहुएँ सास पर हुक्म चलाएंगी, शिष्य वचन रुपी बाण से गुरु का दिल भेदन करेंगे । सभी ब्राह्मण बनने की कोशिश करेंगे । उन्हें दान लेने में भी हिचक नहीं होगी । अपने मत के अनुसार किए गए कर्म को ही लोग अपना धर्म बताएंगे। भुखमरी बढ़ेगी और संबंधों की अहमियत खत्म होती जाएगी । लोग पशुओं जैसे आचरण करते मिलेंगे।  मांसाहार बढ़ेगा, सिर्फ धन के लिए ही लोग जिएंगे, भजन के बिना तेज कम होगा, लोगों की उम्र कम होगी। लेकिन अंत में जब इसका आभास होने लगेगा तब फिर धर्म की और लोगों की प्रवृत्ति बढ़ेगी । कलयुग के लोगों में धर्म की प्रवृति बढ़ा कर उनका उद्धार करने की जिम्मेदारी श्री शुक जी को सौंपी गई और वह इसके लिए तैयार भी हो गए।

महाराज जी ने कहा कि भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी।  लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई । यह पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है । जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं । भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए । गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी।  धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भोजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी । संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है । क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित्र ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पंडित देवकीनंदन जी ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए । व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए । जब श्री शुकदेव जी पिता की आज्ञा पर जनक जी के यहां पहुंचे तब जनक जी ने उन्हें 3 दिनों तक इंतजार कराया। लेकिन शुकदेव जी के मुख पर प्रसन्नता के अलावा कोई भाव नहीं आया। जनक जी ने उन्हें कई सुंदरियों के बीच रखा । लेकिन सुखदेव जी नजरें झुका अपने इष्ट देव को भजते रहें । याद रखना भक्ति में नजर झुका कर रखना। जनक जी ने उनके ब्रह्मचर्य का परीक्षण कर लिया। कथा के बीच में महाराज जी भगवान के गीतों से भाव विभोर कर रहे हैं। पंडाल में भागवत कथा सुनने श्रोताओं का हुजूम उमड़ रहा है।

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